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ओपेक से क़तर का 'तलाक़' और सऊदी अरब

क़तर अब ओपेक का हिस्सा नहीं रहेगा. तेल उत्पादक देशों के इस संगठन का क़तर 57 सालों से हिस्सा था. ओपेक देश तेल का जितना उत्पादन करते है, क़तर की उसमें हिस्सेदारी महज़ दो फ़ीसदी ही रही है. लेकिन खाड़ी के इस छोटे से देश के ओपेक जैसे ताक़तवर संगठन से बाहर निकलने के फ़ैसले को मध्य पूर्व की राजनीति में एक भूकंप की तरह देखा जा रहा है. साल 1960 में इसके गठन के बाद से क़तर मध्य पूर्व का पहला देश है जो ओपेक से बाहर निकला है. क़तर के फ़ैसले की टाइमिंग भी ऐसी रखी गई है जब छह दिसंबर को वियना में ओपेक देशों की बैठक होने वाली है. हालांकि क़तर के ऊर्जा मंत्री साद अल-काबी ने इस बात से इनकार किया है कि मध्य पूर्व के राजनीतिक हालात के कारण उनके देश को ये फ़ैसला लेना पड़ा. क़तर बड़ा खिलाड़ी क़तर ये दलील दे रहा है कि उसकी प्राथमिकता में तेल नहीं बल्कि गैस का उत्पादन है. दोहा में साद अल-काबी ने कहा, " क़तर ने ये तय किया है कि जनवरी, 2019 से वो ओपेक का हिस्सा नहीं रहेगा. इस फ़ैसले के बारे में ओपेक को बता दिया गया है." यहां सवाल ये उठता है कि क़तर आख़िर क्यों तेल की जगह गैस पर फ़ो...

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